Lucknow News: स्वामी प्रसाद मौर्य का इस्तीफा, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को पत्र में लिखा, 'मेरी समझ से परे है कि...'

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लखनऊ : अपने विवादित बयानों को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से त्यागपत्र दे दिया। हालांकि मौर्य सपा से एमएलसी बने रहेंगे। मौर्य ने पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के नाम लिखा त्यागपत्र सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा किया। उन्होंने कहा कि वह बिना पद के भी पार्टी को मजबूत करने के लिए तत्पर रहेंगे। स्वामी प्रसाद मौर्य श्री रामचरितमानस और सनातन धर्म के साथ-साथ अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर भी कई विवादास्पद बयान दे चुके हैं, जिसका उनकी पार्टी में ही विरोध हुआ था। प्राण प्रतिष्ठा के औचित्य पर सवाल उठाने पर विधानसभा में सपा के मुख्य सचेतक मनोज पांडे ने हाल में उन्हें विक्षिप्त व्यक्ति कहा था।

पत्र में क्या कुछ लिखा है, जानते हैं...

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‘पच्चासी तो हमारा है, 15 में भी बंटवारा है’
मौर्य ने पत्र की शुरुआती में ही सपा में आने के मकसद का खुलासा करते हुए लिखा, ‘जबसे मैं समाजवादी पार्टी में सम्मिलित हुआ, लगातार जनाधार बढ़ाने की कोशिश की। सपा में शामिल होने के दिन ही मैंने नारा दिया था ‘पच्चासी तो हमारा है, 15 में भी बंटवारा है।' हमारे महापुरूषों ने भी इसी तरह की लाइन खींची थी। भारतीय संविधान निर्माता बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की बात की तो डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा कि ‘सोशलिस्टो ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावै सौ में साठ’, शहीद जगदेव बाबू कुशवाहा और रामस्वरूप वर्मा ने कहा था ‘सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है’, इसी प्रकार सामाजिक परिवर्तन के महानायक काशीराम साहब का भी वही था नारा ’85 बनाम 15 का।'

किंतु पार्टी द्वारा लगातार इस नारे को निष्प्रभावी करने एवं वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सैकड़ों प्रत्याशियों का पर्चा और सिंबल दाखिल होने के बाद अचानक प्रत्याशियों के बदलने के बावजूद भी पार्टी का जनाधार बढ़ाने में सफल रहे। उसी का परिणाम था कि सपा के पास जहां मात्र 45 विधायक थे वहीं पर विधानसभा चुनाव 2022 के बाद यह संख्या 110 विधायकों की हो गई थी। फिर भी बिना किसी मांग के आपने मुझे विधान परिषद में भेजा और ठीक इसके बाद राष्ट्रीय महासचिव बनाया। इस सम्मान के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

मौर्य ने पत्र में आगे लिखा, ‘पार्टी का जनाधार बढ़ाने का क्रम मैंने अपने तौर-तरीके से जारी रखा। इसी क्रम में मैंने आदिवासियों, दलितों व पिछड़ोंं को जगाकर और सावधान कर वापस लाने की कोशिश की तो पार्टी के ही कुछ छुटभइये व कुछ बड़े नेता ‘मौर्य जी का निजी बयान है’ कहकर इस धार को कुंठित करने की कोशिश की। मैंने अन्यथा नहीं लिया। मैंने पाखंड व आडंबर पर प्रहार किया तो भी यही लोग फिर इसी प्रकार की बात कहते नजर आए। इसी अभियान के दौरान मुझे गोली मारने, हत्या कर देने, तलवार से सिर कलम करने, जीभ काटने, नाक-कान काटने, हाथ काटने की सुपारी भी दी गई। अनेकों बार जानलेवा हमले भी हुए, अपनी सुरक्षा की बिना चिंता किये हुए मैं अपने अभियान में निरंतर चलता रहा।'

हैरानी तो तब हुई, जब पार्टी के वरिष्ठतम नेता चुप रहने के बजाय ‘मौर्य जी का निजी बयान’ कहकर कार्यकर्ताओं के हौसले को तोड़ने की कोशिश की। मैं नहीं समझ पाया एक राष्ट्रीय महासचिव हूं, जिसका कोई भी बयान निजी बयान हो जाता है और पार्टी के कुछ राष्ट्रीय महासचिव व नेता ऐसे भी हैं जिनका हर बयान पार्टी का हो जाता है। एक ही स्तर के पदाधिकारियों में कुछ का निजी और कुछ का पार्टी का बयान कैसे हो जाता है, यह समझ के परे है।

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