बिखरता विपक्षी कुनबा

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2024 लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सात माह पूर्व बना आइएनडीआइए गठबंधन बिखरता जा रहा है। उससे जुड़े सहयोगी दल चाहें कितना भी दावा करें कि हम गठबंधन के साथ हैं, लेकिन पार्टियों में चलता अंतर्द्वंद्व और असीम महत्वाकांक्षाओं की वजह से कोई मजबूत पहल सिरे चढ़ते नहीं दिख रही है। गुरुवार को नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ फारूक अब्दुल्ला ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात कही है।

उनका कहना है कि उनकी पार्टी किसी भी दल के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं करेगी। हालांकि बाद में उनके बेटे उमर अब्दुल्ला ने सफाई देते हुए कहा कि हम आइएनडीआइए से अलग नहीं हो रहे हैं। आइएनडीआइए के साथ अभी सीटों पर तालमेल को लेकर कोई अंतिम बातचीत नहीं हुई है। यह कहना गलत नहीं होगा कि विपक्षी एकता की कमजोरी की मुख्य वजह क्षेत्रीय दलों में किसी भी कीमत पर समझौते की मंशा का न दिखना है।

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इसके अलावा एक के बाद एक गठबंधन के प्रमुख चेहरों का गठबंधन से दूरी बनाना मुख्य कारणों में से एक है। जैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आइएनडीआइए के मुख्य सूत्रधार माने जा रहे थे, लेकिन उनका अचानक से एनडीए में शामिल होना गठबंधन के लिए बहुत बड़ा झटका था। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गठबंधन के प्रमुख नेता जयंत चौधरी का भी एनडीए में शामिल होना गठबंधन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।

गौरतलब है कि सीटों के बंटवारे को लेकर विपक्षी गठबंधन में शुरू से ही स्थिति साफ नहीं हो सकी है। जबकि सीटों के बंटवारे को लेकर कई बार बैठकें भी हुईं, लेकिन उन बैठकों का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। यदि सीटों की स्थिति पर बात करें तो बंगाल में टीएमसी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही कह चुकी हैं कि उनकी पार्टी अकेले लोस चुनाव लड़ेगी। पंजाब में भी सत्ताधारी आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ सीटों के बंटबारे को लेकर ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। यही स्थिति दिल्ली और उत्तर प्रदेश में है। 

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ही सभी राज्यों में अपनी पहचान रखती है, ऐसे में सभी क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के साथ ही सीटों का बंटबारा करना होगा, लेकिन कोई भी दल कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने में खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है। गठबंधन के दिन ब दिन बिखरने का मुख्य कारण यह भी है कि गठबंधन अपना प्रधानमंत्री का चेहरा स्पष्ट नहीं कर सका।

इसकी मुख्य वजह है कि कांग्रेस अपनी पार्टी के किसी चेहरे को प्रधानमंत्री की दावेदारी के रूप में आगे करना चाहती है और इस पर वह कहीं पर भी समझौते की स्थिति में नहीं दिख रही है। टीएमसी ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाना चाह रही थी। कहना गलत नहीं होगा कि पार्टियों की असीम महत्वाकांक्षाओं की वजह से विपक्षी गठबंधन आइएनडीआइए में आपस में कोई सामंजस्य नहीं बना सका जिसकी वजह से गठबंधन बिखरता जा रहा है।

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