प्रतिस्पर्धी वैश्विक राजनीति

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भारत और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता तेज हो गई है और सत्ता व रसूख के लिए संघर्ष नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। चीन का एक मात्र लक्ष्य एक एशियाई ताकत के रूप में अपने रुतबे को और अधिक बढ़ाना, हिंद महासागर के विशाल संसाधनों तक अपनी पहुंच बनाना, भारत की घेराबंदी करना, संचार की महत्वपूर्ण समुद्री लाइनों को सुरक्षित करना और विशेष रूप से शिनजियांग और तिब्बत जैसे अपने अस्थिर क्षेत्रों में आर्थिक विकास की शुरुआत करना है। 

जबकि भारत वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से ‘वैश्विक दक्षिण’का नेतृत्व करने और विश्व राजनीति में प्रमुख हितधारक बनने के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा रखता है। पड़ोस में  जटिलताओं से उसके प्रयासों में बाधा आ रही है। दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय व्यवस्था में रणनीतिक वर्चस्व के लिए भारत और चीन होड़ करते रहे हैं और सीमा विवादों में उलझे रहते हैं। 

हालांकि, अपने तमाम मतभेदों के बावजूद दोनों देशों ने अतीत में द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सहयोग भी किया है। वास्तव में वैश्विक राजनीति एक प्रतिस्पर्धी खेल है। ऐसे में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह कहना महत्वपूर्ण है कि चीन भारत के पड़ोसी देशों को प्रभावित करेगा और भारत को ऐसी ‘प्रतिस्पर्धी राजनीति’ से नहीं डरना चाहिए। एक प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के नाते, चीन संसाधनों का इस्तेमाल करके चीजों को अपने तरीके से आकार देने की कोशिश करेगा।

भारत ने अतीत में वैश्विक उथल-पुथल का सामना अच्छी तरह से किया है। फिर भी दक्षिण एशिया में राजनीतिक रूप से भारत विरोधी शासनों का उदय चिंता की बात है। भारत और मालदीव के बीच तनावपूर्ण संबंध हैं। विदेश मंत्री ने मंगलवार को कहा कि हर देश के पड़ोस में समस्याएं हैं। हमारा काम अनुमान लगाना, आकलन करना और प्रतिक्रिया देना है। अंत में पड़ोसियों के एक-दूसरे के साथ संबंध रहते हैं। 

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राजनीति और कूटनीति को परिभाषित करते हुए जयशंकर ने अहम बात कही कि राजनीति में तीखे रुख अपनाए जाते हैं और कूटनीति हमेशा उन तीखे रुख से नहीं चलती। आखिरकार, पड़ोसियों को एक-दूसरे की जरूरत होती है। इतिहास और भूगोल बहुत शक्तिशाली ताकतें हैं। इससे कोई बच नहीं सकता। 

इन हालात में आगे बढ़ने के लिए भारत को आर्थिक कनेक्टिविटी को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए और सकारात्मक संबंधों के लिए अपने ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग करना चाहिए। विकसित हो रहे दक्षिण एशियाई परिदृश्य में एक स्थिरताकारी शक्ति बनने के लिए रणनीतिक संचार, क्षेत्रीय मंचों में सक्रिय भागीदारी और  दीर्घकालिक दृष्टिकोण भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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