बड़ा कदम

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उच्चतम न्यायालय ने सांंसदों और विधायकों के विशेषाधिकार से जुड़े मामले में सोमवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। संसद या विधानसभाओं में पैसे लेकर वोट डालने वाले नेताओं को सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा झटका दिया है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर सांसद या विधायक रिश्वत लेकर सदन में भाषण देते हैं या वोट देते हैं तो उन पर कोर्ट में आपराधिक मामला चलाया जा सकता है। यह फैसला ऐतिहासिक है। सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के एक फैसले को बदलते हुए कहा कि चयनित प्रतिनिधियों को मिला विशेषाधिकार उन्हें घूसखोरी के मामले में कानूनी कार्यवाही से राहत नहीं देता है।

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दरअसल, साल 1991 के आम चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की और नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन जुलाई 1993 के मानसून सत्र में ही राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ गया। तब आरोप लगे कि शिबू सोरेन और उनकी पार्टी के चार सांसदों ने पैसे लेकर लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोटिंग की।

वर्ष 1998 में पांच सदस्यीय पीठ ने फैसला सुनाया था कि सांसदों और विधायकों को संविधान के अनुच्छेद 105 (2) और 194 (2) द्वारा प्रदत्त संसदीय विशेषाधिकारों के तहत विधानसभा में भाषण देने और वोट देने के लिए लिए मुकदमा चलाने से छूट दी गई है।

अब नया मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट झारखंड मुक्ति मोर्चा की विधायक सीता सोरेन के एक कथित रिश्वत मामले की सुनवाई कर रहा था। सीता सोरेन पर आरोप था कि उन्होंने साल 2012 में राज्यसभा के चुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार को वोट देने के लिए रिश्वत ली।

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ ने  कहा कि पैसे लेकर वोट डालना हमारे लोकतंत्र के लिए जहर के बराबर है। भ्रष्टाचार करने और घूस लेने वाले विधायक-सांसद भारत के संसदीय लोकतंत्र को तबाह कर रहे हैं। यानि नए फैसले के तहत अगर कोई सांसद या विधायक पैसे लेकर सदन या विधानसभाओं में वोट देता है या भाषण देता है तो उसके खिलाफ मुकदमा चलेगा।

उन्हें जनप्रतिनिधि के तौर पर मिलने वाला विशेषाधिकार कानूनी कार्यवाही से राहत नहीं देता है। अब सीता सोरेन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इस फैसले का असर महुआ मोइत्रा पर भी दिखाई दे सकता है। उन पर भी रिश्वत लेकर सदन में सवाल पूछने का आरोप है।

महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उच्चतम न्यायालय के  फैसले को शानदार करार दिया और कहा कि इससे देश में साफ-सुथरी राजनीति सुनिश्चित होगी तथा व्यवस्था में लोगों का विश्वास गहरा होगा।  भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से मूल्य गायब हैं। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को राजनीति में नैतिकता या राजनीतिक शुचिता की दिशा में बड़ा कदम कहा जा सकता है। 

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